Ravi ki duniya

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Thursday, October 29, 2015

व्यंग्य : छोटा राजन को लाने मैं भी जाऊंगा





जब फूलनदेवी जी ने आत्म समर्पण किया था तो पूरे का पूरा सूबा वहां खड़ा था. यहाँ तक कि प्रदेश के मुख्य मंत्री भी वहाँ थे. जब से पता चला है कि छोटा राजन पकड़ा गया...पकड़ाया गया...आत्म समर्पण किया है और वो भी बाली में तब से दिल्ली, मुम्बई में कूद-फाँद मची है. कौन कौन बाली जायेगा. चलो बुलावा आया है, भाऊ ने बुलाया है.

मैंने भी अर्ज़ी लगा दी है. भाऊ वास्ते खाऊ गल्ली की रगड़ा पैटिस, वडा-पाव, काला खट्टा, दाल भाखरी का ऑर्डर भी दे छोड़ा है. साथ ले कर जाऊंगा. मला मायत है भाऊ को क्या आवड़ता है क्या नहीं. इतने दिन से ऊट्पटांग फास्ट फूड खा-खा के सेहत बिगाड़ ली होनी है भाऊ ने. यह लेख लिखे जाने तक लिस्ट फाइनल नहीं हुइ है कि कौन कौन कितने मानुष बाली जाने की पैकिंग कर रहे हैं. फक़त मराठी मानुष जाणार या पर- प्रांतियों में से भी किसी का नम्बर लगेगा. मी मुम्बईकर (पिछले 15 बरस से) उस से पहले उत्तर भारतीय अत: दोनों कोटों में अपना चुना जाना नक्की है.

बाली पर्यटन स्थल है. बाली घूमना भी हो जायेगा. अब ये थोड़े है कि भाऊ एयरपोर्ट की लॉन्ज में होगा...ऑल रैडी बोर्डिंग पास ले कर तैयार. अरे जब बाहर गाँव से बाली आये हैं तो थोड़ा देखेंगे भालेंगे. स्टडी करेंगे कि बाली में ऐसा क्या है जो छोटा राजन वहाँ गया और पकड़ा गया. ताकि इंडिया के शहर या राज्य को हू ब हू वैसा ही बनाया जा सके. अपने राज्य यूँ भी चिल्ल पौं मचाते फिरते हैं... विशेष दर्ज़ा दो ....विशेष दर्ज़ा दो.  तो जाओ दिया. विकास पुरुष पंत प्रधान ऐसा विकास करेंगे ऐसा विकास करेंगे कि भाईयो और बहनों हर राज्य में एक एक बाली स्थापित हो जायेगा. इससे क्या होगा कि छोटा राजन जैसे देसी छोटे छोटे राजनों को एक आश्रय स्थल मिल जायेगा. फिर सरकार की मर्ज़ी पकड़े, छोड़े, सरंक्षण दे. छोटा राजन को शॉर्ट करो तो बनता है छोरा. प्रात: स्मरणीय माननीय नेता जी तो पहले ही कह दिये हैं “ लड़का लोग से गलती हो जाया करती है”

विषय से भटक न जायें इसलिये आपको वापिस बाली लिये चलते हैं. वहाँ के समुद्र तट, वहाँ के नृत्य, नाइट लाइफ. हम बाली से पर्यटन के क्षेत्र में बहुत कुछ सीख सकते हैं.  ऐसे में छोटा राजन सीखा-सिखाया हमें एक्स्पर्ट मिल रहा है अत: उसके तज़ुर्बे का फायदा उठाना है. इसे कहते हैं एफ.डी.आई. ( फॉरेन डाइरेक्ट इनवेस्टमेंट)  या ये पी.पी.पी. हुआ ? हमारे यहाँ पहले भी सर चार्ल्स शोभराज उर्फ बिकिनी किलर नामक एक पर्यटन विशेषज्ञ हुए हैं.

छोटा राजन या छोटा शक़ील से ये कदापि नहीं समझ लेना चाहिये कि ये किसी भी मामले में छोटे हैं. ये छोटा तो एक बड़े के लिये आदरसूचक के तौर पर रखा गया है. ये बेकार का विवाद है कि छोटा राजन को पकड़ना आसान था. जी नहीं. यदि ऐसा था तो पिछले 20 साल से क्यों नहीं ये आसान काम सम्पन्न हुआ. ऐसा कहना भाऊ के पुण्य प्रताप को, भाऊ के साहस, मान-सम्मान कीर्ति को, क्षमता को कम आँकना है. छोटे लोग, छोटी सोच. बड़ा सोचने का, बड़ा करने का. अब ये क्या बात हुई कि छोटा राजन को पकड़ना आसान दाऊद को पकड़ना मुश्किल. ये कम्पैरिजन क्यों. मैं महापुरुषों की ऐसी किसी भी तुलना के खिलाफ हूं. सबका अपना अपना रोल, अपना अपना क्षेत्र, अपनी अपनी तकनीक और थियेट्रिक्स होती है. सुल्ताना डाकू की तुलना डाकू मानसिंह से नहीं की जानी चाहिये. पुतली बाई अपनी जगह थीं फूलनदेवी जी अपनी. जब दाऊद जी इंडिया आ जायेंगे तो आप क्या कहेंगे ये तो आसान था अब जैक स्पैरो ( पाइरेट्स ऑफ कैरिबियन) को पकड़ के दिखाओ.

मैं भी क्या किस्सा ले कर बैठ गया.  अरे मेरा स्विम वियर कहाँ है .... ?

Wednesday, October 14, 2015

व्यंग्य: मेरा इनाम वापस लो...वापस लो


मैं बहुत बड़ा लेखक, कवि नहीं, न सही पर मुझे भी अधिकार है कि मैं यह मांग कर सकूं कि अपने जो भी इनाम वापस करना चाहूं कर सकूं और इस समाचार को हर बुलैटिन में चार- चार बार सभी चैनल दिखायें और मेरा इंटरव्यू लिया जाये. राजकपूर जी ‘श्री 420’ नामक फिल्म में अपना ईमानदारी का मेडल बेचना चाहते थे. मनोज कुमार जी फिल्म ‘रोटी कपड़ा मकान’ में इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति के पास अपनी कॉलेज की डिग्री टुकड़े टुकड़े कर देते हैं.

ज़माना तब से काफी आगे आ गया है. इनाम भी बढ़ गये हैं और लेने देने वाले भी. कुछ संस्थाओं का तो फुल टाइम जॉब ही यही है कि साल के तीसों दिन बारहों महीना खोद खोद कर प्रतिभाओं को ढूंढते फिरते हैं और नाईजिरियन्स की तरह अच्छा खासा खर्चा पानी ले कर फूलों का हार, एक अदद नारियल व शॉल और बस सम्मान समारोह सम्पन्न.

आजकल इनाम लौटाने की होड़ लगी हुई है. मैंने भी सोचा मेरे पास भी एक दो इनाम हैं भले साहित्य के न सही. दरसल मेरे इनाम आलू दौड़ और तीन टाँग की दौड़ के हैं स्कूल के टाईम के. आखिरकार इनाम तो इनाम हैं. और उन्हें वापस करने में मुझे वैसी ही गरिमा और प्रतिष्ठा का एहसास कराना सरकार का कर्तव्य है जैसा कि वह अन्य साहित्य रचयिताओं को करा रही है. प्राइम टाइम में इस पर बहस होनी चाहिये. मैं चाहता हूं कि पात्रा हों या गोस्वामी, रवीश हों या अभिज्ञान सब दो चार दिन गला फाड़ फाड़ कर मेरा ही ज़िक़्र करें. जो इनाम दे नहीं सकता वो इनाम लौटाने के महत्व और उसकी कीमत का अंदाज़ भी नहीं लगा सकता. 

ऐसे ही किसी कार्यक्रम में अगर मुझे स्याही से एलर्जी नहीं होती तो स्याही भी पुतवा लेता... मगर विडम्बना देखिये कालिख पोतने वालों को तो इनाम मिल रहा है मगर पुतवाने वाले को कुछ नहीं. यह सरासर बेइंसाफी है. मुझे तो सोच सोच कर ही कुछ ऐसा ‘फील’ आ रहा है जैसा कि उस चिड़िया को आ रहा होगा जो मकान में आग लगने पर चोंच में पानी भर भर के आग बुझाने का यत्न कर रही थी और लोगों के हँसने पर बोली “कल जब इतिहास लिखा जायेगा तो मेरा नाम भी आग बुझाने वालों में लिखा जायेगा न कि तमाशबीनों में”

एक और विचार मेरे मन में आ रहा है कि क्यों न कुछ साहित्य संस्थाएं मुझे इस शर्त पर कुछ इनामात दे दें कि मैं उनको एक आध हफ्ते में वापस लौटा दूंगा.

इनाम लौटाने के सुख की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू !!