Ravi ki duniya

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Thursday, October 21, 2010

सब ‘फिक्स’ है

पिछले दिनों बहुत बावेला मचा था कि क्रिकेट मैच फिक्स होते हैं. ये पब्लिक भी अजीब है जब खूब मोल-भाव होते थे कहते थे रेट फिक्स होने चाहिए. रेट फिक्स हो गए तो उन्हें वो स्थिति भी नहीं भाई. सुपरबाज़ार में रेट फिक्स होते थे.मित्र लोगों ने उसकी वो गत बनाई कि सुपरबाज़ार में लूट-खसोट और घोटाले ही सुपर रह गए. आपातकाल के दौरान दुकानदारों ने अपने माल के रेट फिक्स किये और सरकार ने बच्चे फिक्स कराने चाहे तो मित्र मतदाताओं ने आपातकाल की माता कांग्रेस की वो हालत की कि सत्ता से उसकी नसबंदी ही कर दी. दुकानदारो ने ग्राहकों की नब्ज़ पहचान ली है अतः भाई लोगों ने पूरे बारहमासी ‘सेल’ के इंतजाम कर दिए हैं और ‘सेल’ के पक्के बोर्ड ही बना कर टांग दिए हैं. ग्राहक खासकर ग्राहिकाएं उसे देख कर वैसे ही खिँची चली आती हैं जैसे मछली काँटे में फंसे चारे को देखकर.






एक क्रिकेट मैच फिक्स होने पर इतना बवाल क्यों ? . समझ से परे है. हमारे मुल्क में क्या फिक्स नहीं है. गर्भावस्था से ही क्या लिंग परीक्षण से ‘बेबी बॉय’ फिक्स नहीं हो जाते. क्या नर्सिंग होम और उसमें होने वाले बेफालतू के टेस्ट और सीजेरियन फिक्स नहीं हैं. अस्पतालों के केमिस्ट और टेस्ट केन्द्र फिक्स नहीं हैं. हद तो तब हुई जब पता चला कि कुछ लिंग परीक्षण केन्द्र तो अब गर्भ में लड़का होते हुए भी लड़की बता कर ऑपरेशन की फीस झाड लेते हैं. बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र प्राप्त करने की मशक्कत आपने की है कभी ? स्कूल में नर्सरी में दाखिला दिलाने ले जाएँ तो पूरी तैयारी के साथ ग्वाटेमाला की राजधानी से लेकर व्हेल मछली के दांतों की संख्या आपको पता हो तो भी दाखिला नहीं मिलने के पूरे-पूरे चांस होते हैं. हाँ, अगर सीट फिक्स हो गयी है तो बात और है. फिर तो इतना होनहार क्यूट और ब्रिलिएंट बच्चा प्रिंसिपल के जीवनकाल में पहला और अंतिम आपका ही है.






स्कूल वालों के बुक सेलर्स से लेकर यूनीफॉर्म वाले तक फिक्स होते हैं जो कि अपने लकी नंबर से कीमतों को गुणा करके वस्तुएँ आपको बेचते हैं. हमने पूरा स्कूली जीवन एक ही यूनिफार्म में काट दिया. आज बच्चों की जूनियर की अलग यूनिफार्म है, सीनियर की अलग. सोमवार की अलग है, शुक्रवार की अलग. मुझे डर है कहीं एक अटैची में बच्चे अब स्कूल बैग के साथ यूनिफार्म न ले जाने लगें कि आधी छुट्टी से पहले की एक यूनिफार्म और आधी छुट्टी के बाद की दूसरी यूनिफार्म है.






मेरी सोसाइटी में ज्यादातर घरों में पति-पत्नी दोनों ऑफिस जाते हैं और बच्चे क्रश या आया के भरोसे पलते हैं. ये बच्चे सब्जी वाले और आइस क्रीम वाले को अंकल कहते हैं. मम्मी पापा के अलावा सारी दुनियां इनके लिए बस अंकल आंटी हैं. सोसाइटी में सबके रेट फिक्स हैं. टेलीफोन बिल,बिजली का बिल,हाउस टैक्स जमा कराने से लेकर बाज़ार से सामान लाने का भी एक रेट फिक्स है.






अब तो आशीर्वाद भी इंटरनेट के माध्यम से आप तक एक फिक्स दक्षिणा के तहत पहुँच जाता है. जय हो गुरुदेव. विज्ञान,धर्म और व्यापर की कैसी अदभुत त्रिवेणी है.तारणहार चाहिए, जनता तो तारने को सदैव तत्पर रहती है. टी.वी. चैनलों पर इतने ‘गुरु’ हो गए हैं कि ऐसा न हो कि चेलों का अकाल पड़ जाये. ये रामराज नहीं तो और क्या है. सुबह-सुबह टी.वी. खोलें सभी आपको भव-सागर पार कराने को “ मेरी नाव में बैठो .. हे साहब ..हे भाई...हे माई ...इधर आओ. “






कहाँ जा रहे हो, किधर ध्यान है


बैकुंठ में सीट दिलाने की यही दूकान है






तो भाई लोगों ने आपके आगे का इंतज़ाम भी फिक्स करा दिया है. एक आप हैं बजाय आभार मानने के ज़रा सी मैच फिक्सिंग का रोना रोये जा रहे हैं. कितने सारे हेंडसम ही मैंन हीरोज की अप्पने पोल खोल दी. त्वाडा जवाब नहीं. अब दिल है तो धड़केगा भी.धडकने को सांस चाहिए. कहीं जूते भी सांस लेते हैं.






दुसरे को सफल देख आपको चिढ होती है.आप ये जान लीजिए कि इस संसार में सब वस्तुएँ ‘फिक्स’ हैं. क्या आपको अपने कसबे के मेले का ‘लोक-परलोक’ या ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ पवेलियन याद नहीं. याद करिये कैसे आपके यहाँ के कर्मों की सज़ा वहां फिक्स है खौलते तेल के कढाहे में जलाना, आरे से काटना, आग में भूनना इत्यादि इत्यादि.आप ज्योतिष में, वास्तु में, फेंग शुई में रूचि क्यों लेते हैं. अपना लोक-परलोक फिक्स कराने को ही तो. आप शादी-ब्याह, दहेज सब तो फिक्स कराना चाहते हैं मगर ऊँगली दूसरे पर उठाते हैं. नौकरी हो या पदोन्नति सब ‘फिक्स’ चाहते हैं और इसके लिए लाखों देने को तत्पर हैं.






तो महाराज इस नश्वर संसार में जन्म और मृत्यु फिक्स है. कब भूकंप आएगा, कब ग्रहण लगेगा, कब पूर्णमासी होगी, कब अमावस, कब चुनाव होंगे, कब बूथ कैपचरिंग. क्या हर बजट में पेट्रोल, सिगरेट के दाम और रेल किराये में बढ़ोतरी फिक्स नहीं. क्या हिंदी फिल्मों में कुम्भ के मेले में दो जुड़वां भाईयों का बिछुडना फिक्स नहीं. एक का अपराधी दूसरे का पुलिसवाला बनना फिक्स नहीं. क्या हीरोइन का बोल्ड सीन देना और उसका दोष ‘डबल’ के मत्थे मढ देना फिक्स नहीं. ये संसार माया है. इस माया में सबका फँसना फिक्स है और जो इस माया से निकल उसका महान महामानव बनना फिक्स है.













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