Ravi ki duniya

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Friday, October 27, 2017

व्यंग्य: और सुनो ! स्मारक बनेंगे विश्व स्तर के


अभी स्विस जोड़े की फतेहपुर सीकरी में पिटाई पर लगी ‘डिटॉल’ सूखी भी न थी कि घोषणा हुई है कि स्मारक विश्व स्तर के बनेंगे. सही भी है. ये क्या कि अगले सात समंदर पार से आयें और आप देसी लट्ठ-भाले से मारें. उफ्फ़ कितना अमानवीय और प्राचीन तरीका है. ये यूथनेसिया का ज़माना है. मगिंग का नाम ही नहीं सुना होगा आपने जिसमें ‘मगर’ पूरी शालीनता से स्विस नाइफ या ऐसी ही कोई चीज आपके पेट या गले पर लगा कर उपर्युक्त सोफिस्टीकेटेड स्वर में कहता है “ योर मनी और योर लाइफ ? ” आप समझ जाते हैं और चुपचाप अपना पर्स, घड़ी, मोबाइल निकाल कर उसे दे देते हैं. तुरत-फुरत में काम हो जाता है. कितनी विश्व स्तर की सनातन, अहिंसक और वैजीटेरियन ‘मॉडस ऑपरान्डाइ’ है. ये क्या कि बेचारे टूरिस्टों के ऊपर आव देखा न ताव पिल पड़े. हमारी क्या छवि ले कर जायेंगे वो अपने देश. आप कुतुब मीनार, ताज महल, लाल किला या ऐसी ही किसी इमारत को देखने जायें तो पहले तो ऑटो-टैक्सी वाले ही आपके इस ट्रिप को यादगार बनाने में कोई कसर न उठा रखेंगे. ये एक तरह से उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है. वे आपसे औने पौने कुछ भी पूरे अधिकार से चार्ज कर लेंगे. आपने ना नुकुर की तो वे इसे और भी अधिक यादगार बनाने से नहीं चूकेंगे...इतना यादगार..इतना यादगार कि हो सकता है आप अपनी याददाश्त खो बैठें या आपका भी स्मारक यहीं कहीं बनाना पड़े.
आपको देख फौरन यहाँ वहाँ छितरे हुए बैठे लोग आपको पहचान लेते हैं और आपकी आवभगत के लिये पूरी आत्मयीता से जुट जाते हैं. उन्हीं में कोई ‘गाइड’ है, कोई सस्ती सस्ती शॉपिंग कराना चाहता है कोई सस्ती टैक्सी तो कोई सस्ता होटल. आप इनसे बचते-बचाते टिकट खिड़की तक पहुंच भी गये तो समझिये कि स्मारक आधा तो आपने देख ही लिया कारण कि टिकट खिड़की आपको ढूंढे नहीं मिलेगी. एक छुपा हुआ मोखा जैसा होगा जिसमें स्मारक के समय का ही व्यक्ति उदासीन बैठा होगा. वो आपको ऐसे देखेगा कि वो तो सन्नी लियोने या ओबामा को एक्स्पैक्ट कर रहा था कहाँ आप आन टपके. फिर भी वो आप पर लगभग एह्सान सा करते हुए आपको टिकट दे ही देगा. क़ुतुबमीनार में तो मीनार कहीं है और टिकट खिड़की सड़क पार करके दूसरी ओर है. कुछ कुछ वैसे ही है जैसे आपने लोकल बांद्रा वैस्ट से लेनी है और टिकट खिड़की बांद्रा ईस्ट में हो या कि लाल क़िले की टिकट जामा मस्जिद में और जामा मस्जिद की टिकट लाल क़िले में मिले. (वैसे जामा मस्जिद में टिकट नहीं है) आप विदेशी हैं तो मॉडर्न आर्ट की नेशनल गैलरी को देखने की टिकट पांच सौ रुपये है. ताज महल में तो विदेशियों से इतने पैसे टिकट के नाम पर ले लेते है कि वो समझ जाता है वंडर ऑफ दि वर्ल्ड देख रहा है.

पिछलग्गू अभी तक आपके साथ हैं. वो आपको गुड़िया, की-चेन, पोस्ट कार्ड के एलबम आदि आदि बेचना चाहते हैं. फोटोग्राफर अलग आपको तरह तरह के फनी पोज़ में फोटो खिंचाने को उकसायेगा. उनसे बचते बचाते “राँड-साँड साँप-सीढ़ी से बचें तो सेवें काशी” की तर्ज़ पर आप अंदर तो घुस गये. अब आप देखेंगे कि दरबान, गेट कीपर और बाकी कर्मियों को आप में तनिक भी इंटरेस्ट नहीं है. दरअसल आप उनके लिये एक प्रकार से अदृश्य मि. इंडिया हैं. वे या तो आपकी उपस्थिति से अनभिज्ञ अपनी बातों में मशगूल हैं या फिर अलसाये अलसाये ऊँघ रहे हैं. दरअसल उनका शरीर ही यहाँ है वे एक प्रकार से ‘निर्वाण’ को प्राप्त कर चुके हैं. कभी कभी आप किसी ओवर एनथुजिआस्टिक कर्मी से भी टकरा सकते हैं जो आपको हिकारत से देखते हुए हो सकता है आपकी तलाशी लेने पर आमदा हो जाये और नहीं तो आपका झोला उतरवा कर बाहर रखवा ले या फिर ताक़ीद करे कि नो कैमरा नो फोटोग्राफी.

अब अगर आपको टॉयलेट जाना हो तो आप पायेंगे कि या तो वहाँ टॉयलेट है ही नहीं या इतनी दूर है या फिर गेट पर जहां से आप घुसे थे था और आप बहुत पीछे छोड़ आये हैं. यही हाल पीने के पानी का है. अव्वल तो नल दिखेगा नहीं. पूछते पूछते दिख भी गया तो आप पायेंगे कि शायद ये भी क़ुतुबद्दीन या शाह्जहाँ के ही ज़माने का है, क्यों कि दस में से दस बार उसमें पानी नहीं होगा. अभी हम गंगा-जमुना साफ कर रहे हैं. प्लीज बेयर विद अस. हाँ कोई कैंटीन भले दिख जाये. जहां पानी की बोतल के वो श्रद्धा अनुसार कुछ भी चार्ज कर सकता है. एक सौ रुपये से लेकर पाँच सौ रुपये तक. इन जगहों के नलों को इस वजह से बेपानी रखा जाता है ताकि आप कैंटीन का पानी रख सकें. रहीम ने इन कैंटीन वालों के लिये ही कहा था:

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून

अगर शौचालय जाना हो तो हो सकता है आप अपना आइडिया मुल्तवी कर दें. वहां आप पायेंगे कि आप से पहले पूरी दिल्ली, अथवा पूरा का पूरा आगरा, या कि आक्खा मुम्बई आकर वहां पहले ही शौच कर गया है. ये स्थल स्वच्छता पार्टी के नेता जी और फोटोग्राफर की पहुंच से अभी बाहर हैं. बारी नहीं आई है.

अपुष्ट खबरें तो ये भी हैं कि सैल्फी का आविष्कार भारत में ही हुआ है कारण कि टूरिस्ट किसी भारतीय को कैमरा देता तो था फोटो खींचने के लिये अभी टूरिस्ट पोज़ बना ही रहा होता था तब तक यह फोटू खींचने वाला इतनी तेजी से तिड़ी हो जाता था कि टूरिस्ट देखता ही रह जाता और वो उसकी आँखों के सामने-सामने ये जा वो जा. दरअसल आपका फोटो खींचने लायक तो वो ही क्षण होता था. शिकायत करने गये तो पता चला पुलिस ने आपकी घड़ी और मोबाइल भी रखवा लिये. और रात भर हवालात में बंद रखा सो अलग. फैलते-फैलते बात इतनी फैली कि हिमसैल्फ और हरसैल्फ सारे के सारे अनुसंधान में लग गये तब सैल्फी का जन्म हुआ. आवश्यकता आविष्कार की मॉम है. (रही बात फतेह्पुर सीकरी की तो वो बात अलग और अपवाद स्वरूप देखी जानी चाहिये वहां स्विस जोड़े की पिटाई इसीलिये की गई कि उन्होने अपने भारतीय ’प्रशंसकों’ के साथ सैल्फी खिंचाने से नानुकुर की थी.)

अब विश्व स्तर के स्मारक बनेंगे तो पता नहीं क्या होगा. क्या शाहजहाँऔर मुमताज़ उठ बैठेंगे और आपको देख गाने लगेंगे:

“जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा” 

या कि ज़िल्ले सुभानी अपना चोगा पहन आपका खैर मक़दम करेंगे.

पानी दे दें, शौचालय दे दें, विश्वसनीय ट्रांसपोर्ट दे दें और लुक्का लोग जो ठगने को आपके आस-पास मँडराते रहते हैं उनसे निज़ात मिल जाये तो समझो स्मारक खुद ही विश्व स्तर के हो जायेंगे. बड़ा काम है विश्व स्तर की इमारतों को बनाना उस से भी कहीं अधिक महान कार्य है इन इमारतों को विश्व स्तर का बनाये रखना. जब तक आस-पास मँडराते बर्बर ठगों के दल के दल की आमदनी का सहारा आपसे छिनैती और ठगी ही है तो कैसे विश्व स्तर की रख-रखाव हो पायेगी? पहले हम तो विश्व स्तर के हो जायें. स्मारक खुद्बखुद हो जाने हैं जी.

Monday, June 12, 2017

व्यंग्य: जान से भी बड़ा एक तोहफा......कारपेट, ए.सी. और सोफा




शहीद सागर के घर से कारपेट, ए.सी., और सोफा, सी.एम. के विजिट के बाद वापस ले गये. ये बुरी खबर नहीं. आप लोग जब असलियत जानोगे तब तारीफ करोगे. असल में बेचारा ग़रीब परिवार कैसे तो ए.सी. का बिजली का बिल भरता , कैसे कारपेट क्लीन करने को वैक्यूम क्लीनर खरीदता, और कैसे सोफे को ड्राईक्लीन कराता. बजाय शुक्रगुजार होने के आलोचना कर रहे हैं. बी पॉजिटिव. सोचो शहीद के गरीब परिवार को कितने फिजूल के खर्चे से बचा लिया.अगर ये सब छोड़ देते तो आप ही ने कहना था उनकी गरीबी का मजाक बना दिया.गरीब लोग कैसे ए.सी. चलायेंगे, कैसे कारपेट ड्राई क्लीन/ वैक्युम क्लीन करायेंगे. मोदी/योगी सरकार ने गरीबों का मज़ाक उड़ाया. अब अगर वो बिजली का बिल नहीं दे पाते तो बिजली कट जाती. फिर आप लोगों ने ही लिखते फिरना था शहीद के परिवार की बिजली काटी. फिर वो कटिया का जुगाड़ लगाते. अब आप इंडिया में रहते हो ये मत पूछ बैठना कि कटिया क्या होता है. ये ऐसे ही है जैसे कोई स्पेन में रहे और पूछे बुल फाइट क्या चीज होती है या तमिलनाडु में रहे और पूछे जल्लीकट्टू क्या होता है.
और बाई दि वे ये आप से कहा किसने कि ये ए.सी., ये कारपेट ये सोफा शहीद सागर के परिवार के लिये थे. आपका तो फोकस ही गलत है. ये सब सी.एम साब और उनके अफसरान के लिये था.उन्हें इन सब की आदत है. उन्हे ये सब बापरना आता है. आपको आता है ? आपको तो ए.सी. चलाते कैसे ये भी नहीं पता होगा. आपको पता है फिल्टर कब धोना है...कैसे धोते हैं.कैसे पहले पंखा चलाना है फिर ए.सी. और जब बंद करना है तो कैसे पहले ए.सी. बंद करना है फिर पंखा.

इसी तरह कैसे कारपेट क्लीन करना है. कैसे ड्राइक्लीन कराना है. कैसे बिना जूते इस पर चलना है. कैसे सुबह-शाम ब्रश से हल्के हाथ से साफ करना है. कब कब धूप दिखानी है. जब मेहमान चले जायें तो कैसे रोल करके रखना है.

सोफे पर कैसे बैठते हैं. ये नहीं कि दोनों पैर रख कर उकड़ू हो कर बैठ गये. रामपुर के लक्ष्मण के रणधीर कपूर की तरह या जीतेंद्र के डबल रोल में गाँव वाले जीतेंद्र की तरह. ये सोफा है पुआल नहीं.
अब आप कुछ कुछ समझे कि योगी या मोदी सरकार ग़रीबों का खासकर शहीद ग़रीबों का कितना ख्याल रखती है. और उन्होने कैसे इन तीनों चीजों को ले जाकर इस परिवार की महान मदद की है. कर सकती थी ऐसा कभी मनमोहन की सरकार ?

जब तक सूरज चाँद रहेगा
योगी तेरा नाम रहेगा.

Tuesday, April 4, 2017

Tuesday, November 1, 2016

व्यंग्य : निंदा पर निबंध



  निंदा कई प्रकार की होती है। भारत में मुख्यतः तीन प्रकार की निंदा पाई जाती हैं। निंदा। कड़ी निंदा व बेहद कड़ी निंदा। निंदा की आमतौर पर कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती है। अतः एक बार की गई निंदा लम्बे समय तक चल सकती है। किन्तु वही/वैसी ही घटना की पुनरावृति होने पर निंदा अथवा कड़ी निंदा स्वाद अनुसार की जा सकती है। 

निंदा का हमारे देश में ऐतहासिक महत्व है। हमारे ऋषि मुनि भी कह गये हैं "निंदक नियरे राखिये ......" पर-निंदा रस सभी रसों में सर्वोपरि है। आप कह सकते हैं कि निंदा रस सभी रसों का राजा है। निंदा ने यह पदवी श्रृंगार रस को पदच्युत कर के हासिल की है। निंदा से बड़ा आत्मिक संतोष मिलता है तथा मनो मस्तिष्क में स्फूर्ति सी छा जाती है दोनों यानि कि करने वाले व सुनने वाले दोनों के। वह भी बिना हींग फिटकरी के। दो निंदक जहां इकट्ठे हो जायें वहां तो समझो दीवाली जैसे पटाखे फूटने लगते हैं। 

प्राय: भारत में जिस प्रकार विश्व के सभी धर्मों के अनुयायी पाये जाते हैं उसी प्रकार सभी प्रकार के निन्दनीय से निन्दनीय निंदक प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं फिर भी प्रमुखतः पड़ोसी निंदक, रिश्तेदार निंदक, बाॅस निंदक आपको सभी मौसम तथा प्रदेशों में मिलेंगे। उत्तर भारत विशेषतः दिल्ली व आसपास के मैदानी क्षेत्र में निंदकों की खासी फसल लहलहाती है।
 
'जब तक सूरज चाँद रहेगा निंदा तेरा नाम रहेगा "

Friday, August 5, 2016

व्यंग्य : जस्ट रिटायर्ड


जैसे हनीमून पर जाने वाले ‘जस्ट मैरिड’ कहलाते हैं उसी तरह रिटायर हो कर नौयडा, ग्रेटर नौयडा, गुड़गाँव और ‘मुलुक’ तथा नेटिव प्लेस जाने वाले जस्ट रिटायर्ड कहलाते हैं. ये जस्ट रिटायर्ड वाले एक अज़ीब सी कशमकश से गुजर रहे होते हैं. इनकी हालत कुछ कुछ मिनोपॉज किस्म की होती है. ये जवान हैं या बूढ़े हो गये इन्हें खुद इस बात का महा कन्फ्यूजन सतत रहता है. इनके हॉरमोंस में अलबत्ता कोई चेंज आता नहीं है मगर न जाने क्यूँ इनके बीवी-बच्चे, आस-पास वाले, इनके मित्र, पड़ोसी तथा सबसे ज्यादा इनके ऑफिस वाले इन्हें कुछ इस तरह से ट्रीट करते हैं कि इनमें बहुत तेजी से अपने हॉरमोंस को ले कर शंका होने लग पड़ती है. इस सब की शुरुआत घर से ही होती है बल्कि कहिये कि घरवाली से ही होती है. उसका मानना होता है कि रिटायर तो आप हुए हो मैं नहीं. बस यहीं से कॉन्फ्लिक्ट चालू. तुमने कहाँ जाना है जो बाथरूम सुबह सुबह घेर के बैठ जाते हो. चलो उठो यहाँ से यहाँ पोचा लगना है. कुछ चल फिर लिया करो ये पेट इतना लटक रहा है. इतना बढ़ा रखा है. कभी इसे भी देख लिया करो. कम खाया करो. नॉन वैज छोड़ दो. दवाई ली या नहीं ?

जब आप ऑफिस फोन लगाते हैं कि कुछ काम की बात हो, कुछ टाइम पास हो. पता लगता है कि आपके अदने से अदने स्टाफ बिजी चल रहे हैं. बहुत काम अचानक से आ गया है. आप फोन उठाने की कह रहे हो यहाँ दम भरने की फुरसत नहीं है. नये साहब ने बहुत सारी मीटिंग्स रख दीं हैं और काम दे दिया है. आप जिस बंदे से ऑफिस में बात करना चाहो वही या तो लीव पर है, या बीमार है या फिर काम में बिजी है. कल तलक जो कर्मचारी आपका नाम सुन कर मिलने दौड़े चले आते थे वह गायब हैं. मोबाइल के चलते अब वे फोन देख कर फोन उठाते ही नहीं हैं. कर लो क्या कर लोगे.

कभी मार्किट या हॉस्पीटल जाने पर कोई पहचान ले तो बड़ी खुशी होती है. और अपने ऊपर विश्वास जमने लगता है. यदा कदा कोई आगे से नमस्ते कर ले तो ऐसा लगता है उसे गले लगा लिया जाये “प्राह ! तू कित्थे सी गा ?” अब आपके पास एक ब्रह्म वाक्य है ‘टाइम ही टाइम एक बार मिल तो लें’ अब आप समाचारपत्र पढ़ते नहीं हैं बल्कि पूरा का पूरा चाट लेते हैं. एक-एक विज्ञापन तक पढ़ डालते हैं. आज शाम को क्या पकेगा ? इस विषय पर अब आप सेमीनार तक कर सकते हैं. कहीं कोई समारोह हो, फंक्शन हो आप सदैव जाने को तत्पर रहते हैं. वो बात दीग़र है कि जबसे पता लगा है आप रिटायर हो गये हैं..इन्वीटेशन आने भी बहुत कम हो गये हैं. कुछ लोग तो पता नहीं जानबूझ कर या इनोसेंटली जुमला कह ही देते हैं “आप तो अभी भी फिट लगते हैं” अब कोई इनसे पूछे कि क्या चाहते हैं वो ? रिटायर तभी माना जायेगा जब अगला व्हीलचेयर या वाकिंग स्टिक ले कर चले.

घर हो या बाहर अब आप धीरे धीरे ड्राइंग रूम से अपनी कोठरी अंग्रेजी में बोले तो बैड रूम की तरफ बढ़ रहे हैं....और फिर न जाने कब एक दिन आप वहीं के डोमीसाइल बन के रह जायेंगे...

Tuesday, July 26, 2016

लघु व्यंग्य कथा : ब्रेकिंग न्यूज चिंकारा हत्या या आत्महत्या





                एक जाँच दल चिंकारों से पूछ्ताछ करेगा और उनके बयान दर्ज़ करेगा कि घटना के दिन चिंकारा किन किन दोस्तों के साथ था.? ........चिंकारा के दोस्त कौन थे...उसकी किसी से रजिश थी क्या ? कोई प्यार - मुहब्बत का चक्कर था क्या ? या फिर ज़मीन के टुकड़े को लेकर कोई विवाद तो न था. आखिर बुजुर्गों ने कहा है कि लड़ाई हमेशा जर, जोरू, ज़मीन को लेकर होती है. बाकी चिंकारों की धर पकड़ जारी है. हो सकता है इस हत्याकाँड के तार विदेश से जुड़े हों अत: एक 45 सदस्यीय मिनी जाँच दल अफ्रीका और अन्य जगह के चिंकारों से भी पूछ्ताछ करेगा. इस बीच एक अध्यादेश जारी कर एक ऐसा क़ानून लाया जायेगा जिसमें चिंकारों की आत्म हत्या को एक अपराध माना जायेगा. 

चिंकारा की कॉल डिटेल्स निकाली जा रही हैं. उसके परिवार के और दोस्तों के फोन को सर्विलेंस पर रखा जा रहा है. इस बीच चिंकारों का एक दल राजधानी के लिये रवाना हो गया है जहां वे वन मंत्री, सूचना मंत्री, और गृह मंत्री से मिलेंगे और ज्ञापन सौंपेंगे कि इस पूरे काँड की जाँच सी.बी.आई से कराई जाये.

व्यंग्य : कथा लोक की लोक कथा




एक राज्य में बड़ी अव्यव्स्था थी यह तय हुआ कि कल सुबह सुबह जो पहला आदमी दिखाई दे उसे ही राजा बना देंगे और वर्तमान राजा को वानप्रस्थ में जाने को कहेंगे. अगले दिन सुबह-सुबह देखा कि एक बड़ी हुई दाढ़ी में साधु जैसा दिखने वाला तेजस्वी व्यक्ति कमंडल लेकर चला जा रहा है.. बस उसकी जय जयकार करते हुए उसे महल में ले आया गया. उसने भी पूरे उत्साह से काम करना शुरू कर दिया और वो इस कोशिश में लग गया कि दुनियां को दिखा दे कि वह सबसे बेहतरीन राजा है, केवल राज्य में बल्कि दुनियां में. कुछ माह तो सब ठीक ही ठाक चला फिर राज्य में सौहार्द बिगड़ने लगा. प्रजा में मार काट मचने लगी. क्या साधु क्या गृहस्थ क्या नौकरी पेशा क्या व्यापारी सब उससे परेशान रहने लगे. बेरोज़गारी वायदे अनुसार कम होने के बजाय बढ़ने लगी. विभिन्न सम्प्रदाय के लोग आपस में लड़ने मरने लगे. नित नये नये रूप में अत्याचार, आगजनी, मार-काट मचने लगी. ऐसा नहीं कि ये सब राजा करा रहा था बल्कि कहना चाहिये कि राजा के वज़ीर, और राज्य के कुटिल व्यक्ति इस सब में मशगूल थे. राजा रोकने में नाकामयाब था. उसे इसमें कोई सरोकार न था. वह हर घटना पर बस दुख जता देता था और इमोशनल हो जाता था. कभी दार्शनिक समान बात करता कभी जब बहुत हाय तौबा मचती तो लोगों से अपील करता कि राज्य में शांति बनाये रखें योग का अभ्यास करें. स्वच्छता को अपनायें. शौचालय बनवायें, खाते खुलवायें, दाल में पानी मिला कर खायें. आदि आदि. मँहगाई आकाश पर थी. हर तरफ हत्या, बलात्कार और दंगे फसाद होते थे. कभी जिंदा गाय को लेकर, कभी मृत गाय को लेकर. आदमी की कीमत गाय की कीमत से कहीं नीचे थी. हाँलाकि कुत्तों को मारने, जलाने और छत से नीचे फेंकने की घटनायें राज्य में खूब होतीं थीं. बल्कि कुत्तों को खानेपकाने के फेस्टिवल होते थे. अलबत्ता गाय को खाना देने और पालन करने के बजाय उनके मालिक उन्हें खुल्ला छोड़ देते थे गाय लोग कूढ़ेदान- कूढ़ेदान जा जा कर शहर की सब गंदगी खातीं थीं. इस तरह स्वच्छता के पावन मिशन में अपना योगदान दे रहीं थीं यहां तक कि पॉलिथिन की थैलियां खा खा कर जान दे रहीं थीं.

ऐसे में राज्य मे इतनी उथल-पुथल देख कर एक दिन मौका देख पड़ोसी राज्य ने हमला बोल दिया. राजा को उसके दरबारियों और गुप्तचरों ने बताया तो राजा बोला कोई बात नहीं मैं हूं ”. फिर बताया शत्रु राज्य में घुस आया है राजा बोला कोई बात नहीं मैं हूं ”. फिर बताया शत्रु राजधानी में आ गया है. राजा बोला कोई बात नहीं मैं हूं न”. फिर एक दिन बताया कि शत्रु महल के द्वार पर आ गया है. राजा बोला "कोई बात नहीं मैं हूं न." फिर बताया गया महाराज शत्रु महल में घुस आया है

इस पर राजा बोला मेरा कमंडल कहाँ है ? मैं तो चला !